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राजेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, इलाहाबादजिंदगी भर नहीं भूलेगी यह बरसात की रात, यह कोई फिल्मी गीत की कड़ी नहीं बल्कि भारत पाकिस्तान के बंटवारे के बाद लाहौर पाकिस्तान से किसी प्रकार जिंदा बच कर लौटे और अब तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता के.एन. कुमार एक लम्बे अर्से बाद संवाददाता से रूबरू होते हुए व्यक्त कर रहे थे।
अधिवक्ता श्री कुमार ने अपनी आप बीती बताते हुए बताया कि उनका जन्म पाकिस्तान के सरगोधा जनपद के भेरा कस्बे में 1935 में श्री केदार नाथ कुमार के घर में हुआ था। उन्होंने बताया कि बचपन से ही उनका मन फिरंगियों की दास्ता से मुक्त होने के लिए व्यग्र था और मात्र सात-आठ वर्ष की उम्र में ही वे सुभाष चन्द्र बोश की इंडियन कोर संस्था के सदस्य बन गये ।
उन्होंने बताया कि 15 अगस्त 1947 को जैसे देश आजाद हुआ और तिरंगा लहराने के साथ ही एक दूसरे जुल्मोसितम की पटकथा तैयार हो गयी क्योंकि अविभाज्य भारत दो भागों में बंट गया और पाकिस्तान का जन्म हुआ ऐसे में वहां तिरंगा लहराने पर रोक लगा दी गयी।
हर तरफ पुलिस के बूटों की थाप ठीक वैसे ही सुनायी पड़ने लगी जैसे कभी फिरंगियों की हुकूमत में हुआ करता था। जहां भी तिरंगा लहराता दिखा उन घरों को घेर लिया गया । जो पकड़े गए उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया हर तरफ बूटों की थाप और गोलियों तड़तड़हट सन्नाटे को चीरती हुई वह आवाज कालीं अंधेरी रात में अत्यन्त ही भयानक लग रही थी।
हम लोग डर के मारे किसी तरह घर में रखे भूसे में छिप गये। तिरंगा फहराने वालों पर बुरी तरह जुल्म ढाया जाने लगा कुछ लोगों को पकड़ कर पीटा गया कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया।
16 सितम्बर 1947 को अधिकारिक तौर पर घोषणा कर दी गई कि सभी हिन्दू घर छोड़कर पाकिस्तान छोड़कर भारत जाने के लिए तैयार हो जाए नहीं तो उनकी हत्या कर दी जायेगी। श्री कुमार ने बताया कि पाक सेना के जवानों के बूटों की थापोें को सुन कस्बे के सभी हिन्दू अन्दर ही अन्दर सहम गये और जिसके पास जो भी सामान ट्रंक आदि था लेकर जाने को तैयार हो गये। अगले दिन सुबह ही सेना की ट्रक आयी और बड़ी संख्या में हिन्दुओं को ट्रकों में भरकर रेलवे स्टेशन के लिए कूच कर दिया।
18 सितम्बर को पूर्वान्ह दस बजे भरे स्टेशन पर लगभग तीन हजार हिन्दू जिसमें स्त्री, पुरूष और बच्चे थे पहुॅंच गए और भारत की ओर आने वाली ट्रेन पर बैठ गये लेकिन ट्रेन अभी मात्र बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर ही पहुॅंची थी कि सारे यात्रियां को उतार कर उनकी हत्या कर दी गयी और लाशों से भरी ट्रेन की बोगियों को अमृतसर के लिए रवाना कर दिया गया। जैसे ही लोगों को पता लगा उन्होंने पाकिस्तान छोड़ने से इनकार कर दिया। काफी जद्दो जहद के बाद दो दिन पश्चात पठान सेना आयी और लोगों को आश्वस्त किया कि उनके साथ कुछ भी गलत नहीं होगा।
उनके आश्वासन पर हम लोग सारे हिन्दु पुनः ट्रेन में सवार हो गएे और ट्रेन आगे बढ़ी अभी ट्रेन मात्र बीस किलोमीटर दूर म्यानी स्टेशन ही पहुंची थी कि ट्रेन को बीच में ही रोक लिया गया और दोनों ओर से गोलीबारी शुरू हो गयी। भारी गोलीबारी के बीच पठानसेना के कैप्टन ने ट्रेन को स्वयं चलाते हुए मलकवाल स्टेशन पहुॅंचा और दूसरी पाक सेना की बटालियन के हवाले कर दिया। उस सेना के स्टेशन पर यात्रियों को ट्रेन सहित कब्जे में लेते ही प्लेटफार्म पर लगे वाटर टैंक और पानी की टोटियों को तोड़ दिया।
किसी को भी ट्रेन से नीचे नहीं उतरने दिया गया। लोग पानी के लिए तड़पते रहे लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गयी और ट्रेन मण्डी बहुलदी तक पहुंची तो सभी को उतार दिया गया और स्टेशन से पैदल ही दस किलोमीटर दूर बनाये गये कैम्प में जाने के लिए कहा गया।इस लाहौर वृतान्त को बताते हुए कई बार श्री कुमार की आंखे भर आयी और ऐसा लगा जैसे उस काली स्याह रात्रि का वर्णन करने में जबान अब साथ नहीं दे रही है लेकिन बहुत कुरेदने के बाद उन्होंने बताया कि भूखे प्यासे सभी लोग उस कैम्प में पहुंचे जहां पहले से ही कुछ लोग मौजूद थे लेकिन वहां भी कोई खाने पीने की कोई सुविधा नहीं थी।
उन्होंने बताया कि उस बड़े से कैम्प में एक चिता जल रही थी जिसमें थोड़ी- थोड़ी देर पर एक -एक लाश को डाला जा रहा था। उन मृतकों के बावत पूछें जाने पर श्री कुमार ने बताया कि वहां कैम्प में जो खाने के लिए आटा या पीने के लिए पानी दिया जाता था उसमें नीला थोथा;तूतिया, कापर सल्फेट मिलाकर दिया जाता था जिसका उपयोग करते हुए स्त्री, पुरूष और बच्चे थोड़ी ही देर में मर जाते थे जिन्हें कैम्प में जल रही चिता में थोड़ी-थोड़ी देर में फेंका जा रहा था जिससे लशों की समुचित गणना नहीं की जा सके कि कितने लोग अब तक मर चुके हैं।
भूंखे- प्यासे हम लोग किसी प्रकार बचने का प्रयास करते रहे इसी बीच बड़े भाई बलराम कुमार ने भारतीय सेना के विंग कमाण्डर से सर्म्पक किया और दो ट्रकें किसी प्रकार वहां कैम्प में पहुंची तो लोगों को जैसे अंधेरी रात में रोशनी की किरण नजर आयी। जितने लोग ट्रकों में आ सकते थे हम सभी लोग ट्रक में सवार हो गये। ट्रक से हम लोग आगे बढ़ रहे थे ट्रक जैसे ही झेलम नदी के ढाल पर पहुंची एक ट्रक ऐसा लगा कि पलट जायेगी लेकिन एक पेड़ सामने आ जाने से ट्रक पल्टी नहीं लेकिन उसमें सवार दो औरतें मर गयीं।
उसी समय पाक सेना के जवानों द्वारा फायरिंग शुरू कर दी गयी लेकिन भरतीय जवानों ने मुॅंहतोड़ जवाब देते हुए मोर्चा संभाल लिया और हमलोग तीन दिन तक सिर नीचा किये हुए लेटे रहे इस दौरान सेना के जवान खाने का डिब्बा जूस आदि फेंक देते थे। जो हम लोगों के जीने का सहारा बना। तीन दिन भारत से ट्रक उठाने के लिए क्रेन आयी और ट्रक को उठाया गया और हम लोग भारत के लिए रवाना हो गये रास्ते में देखा कि बड़ी संख्या में स्त्री, पुरूष और बच्चे पैदल ही लाहौर से चले आ रहे थे।
उन्होंने कहा कि कामोकी नहर पर जो नजरा देखने को मिला उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि हम सब सौभाग्यशाली थे कि बच गये नहीं तो पाक सेना का जुल्मोंसितम कामोकी नहर पर भी इस प्रकार का मंजर ढा रही थी कि उसके सामने जैसे अंग्रेजों के भी जुल्मोंसितम फीके पड़ गये थे।
श्री कुमार ने बताया कि पाक सैनिक भारत आ रहे स्त्री, पुरूष और बच्चों को अलग-अलग करके कतार बद्ध करके उन्हें गोलियां से भून दे रहे थे कुछ बच्चों को नदी में डूबो कर मार दिया जा रहा था। महिलाओं को जबरन खींच ले जा रहे थे। एक औरत किसी प्रकार हम लोगों की ट्रक पर भाग कर चढ़ आयी जिसे हम लोगों ने चढ़ा लिया। अनारकली बाजार में पहुंचने पर एक बार फिर हम लोग पाक सैनिकां के चंगुल में फंस गये और डरने लगे कि कहीं उनकी हत्या न कर दी जाय लेकिन पाकिस्तानी सेना ने हत्या तो नहीं किया लेकिन सभी की तालाशी लेने के बाद उनके ट्रक, समान आदि छीन लिया
कुछ लोग जनेऊधारी थे उनकी जनेऊ उतार कर भेज दिया जब हम लोग अटारी बार्डर तो जान में जान आयी और सभी ने एक स्वर में भारत माता की जय नारे लगाते हुए देश की धरती को माथे से लगाया और अपने - अपने गन्तव्य को रवाना हो गये। वहां से आने के पश्चात इलाहाबाद में वकालत कर रहे हैं।ऐसी रोचक और अनोखी न्यूज़ स्टोरीज़ के लिए गूगल स्टोर से डाउनलोड करें Lopscoop एप, वो भी फ़्री में और कमाएं ढेरों कैश वो भी आसानी से
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