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बेदाग, कांतिमय और गोरी उजली त्वचा की चाहत हर किसी को होती है। अपनी इस चाहत को पूरा करने के लिए महिलाएँ अक्सर ब्लीचिंग का सहारा लेती हैं। आपको बता दें कि दुनिया में त्वचा को ब्लीच करने का यह चलन 19वीं सदी के 30वें दशक में शुरू हुआ, जब एक केमिकल कंपनी में काम करने वाले एफ्रो-अमेरिकन कर्मचारी को अपनी त्वचा पर एक हलका धब्बा नजर आया था। उस धब्बे की जाँच पड़ताल करने पर पता चला कि ऐसा मोनो बेंजाइल ईथर और हाइड्रोक्वनिन नामक केमिकल के त्वचा के संपर्क में आने से हुआ था। लिहाजा इस रसायन को ब्लीचिंग एजेंट के रूप में तय किया गया और तब से इसे ब्लीचिंग में प्रयोग किया जाने लगा।
अब बदलते समय के साथ ब्लीच में भी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। आज बाजार में ऐसी ब्लीचिंग क्रीमें उपलब्ध हैं, जो रसायनों के साथ जड़ी-बूटियों को मिला कर बनाई जाती हैं। आपको मालूम हो कि हमारे देश में पुराने समय से ही यह जानकारी है कि कुछ जड़ी-बूटियों में त्वचा को ब्लीच करने का गुण होता है। हल्दी, तमाल के पत्ते, रक्तचंदन, कस्तूरी मंजाल, केसर और जावित्री आदि जड़ी-बूटियां त्वचा में निखार लाने के साथ-साथ उसमें उपस्थित मेलानिन पिगमेंट को भी कम करती हैं। ये जड़ी-बूटियां ब्लीचिंग के साथ-साथ त्वचा की टोनिंग और उसे पोषण देने का भी काम करती हैं।
दिलचस्प है कि त्वचा में जितना ज्यादा मेलानिन होगा, रंग उतना ही ज्यादा गहरा होगा; जबकि मेलानिन की कम उपस्थिति रंग का साफ होना निश्चित करती है। ब्लीच का मुख्य ध्येय होता है त्वचा में उपस्थित मेलानिन पिगमेंट को कम करना। इसके अलावा चेहरे पर उपस्थित छोटे-छोटे रोएं भी त्वचा के रंग को उजला बनाने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। इनको भी ब्लीच आक्सीडाइज करके छिपा देती है। इस से चेहरे के रोएं भी त्वचा के रंग जैसे हो जाते हैं।
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