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आज भारत में एक बहुत बढ़ा फेसला सामने आया है। जिसके तहत एलजीबीटी क्मूनिटी को एक नयी पहचान मिल गयी है। सीधे शब्दों में कहे तो सुप्रीम कॉर्ट ने ऑर्डर पास किया है जिसके चलते अब भारतीये समाज में गे, समलैंगिक, लेस्बियन और ट्रांसजेंडर होना किसी भ तरह कोइ अपराध नहीं रहा है। कहने को अब समलैंगिक लोग भी भारत में सिर उठा कर रह सकते हैं।
लेकिन बात इतने में ह खत्म नहीं हो जाती है। क्योंकि सभी ने एक लंबी लड़ाइ लड़ी है और साथ ही ये मक्सद पूरा कर दिया है। साथ ही सुप्रीम कॉर्ट ने अर्टिकल 377 को हटा दिया है। इतनी बात होने के बाद जानिये क्या है आर्टिकल 377 और क्यों था ये समलैंगिक क्मूनिटी के लिए जान का दुशमन।
क्या है आर्टिकल 377
भारत में ब्रिटिश शासनकाल में सन 1861 में ये आइपीसी में एक अपराध को तौर पर दर्ज हुआ था। इस प्रावधान में किसी भी तरतह की सेक्शुअल एक्टीविटी जो नेचर के विपरीत हो उसे कानूनी अपराध ठेहराया गया था। इसी प्रावधान के तहत आपको जेल भी हो सकती है।
साल 1994
एड्स भेद भाव विरोधी अंदोलन की शुरुआत हुई जिस पर हर किसी का एक ही कहना था कि ये एड्स, एचआइवी जैसी बीमारियों को बढ़ावा देगा। साथ ही इसी साल धारा 377 के खिलाफ आवाज़ उठाइ थी।
साल 2001
नाज़ फाउनडेशन द्वारा 377 को दिल्ली हाइकोर्ट में चुनौती दी। बता दें नाज़ फाउंडेशन दिल्ली में स्शित एक एनजीऑ है जो एचआइवी और एड्स ग्रस्त लोगों की हर तरतह से मद्द करता है। साथ ही नाज़ फाउंडेशन ने ही दिल्ली हाइ कोर्ट में धारा 377 के खिलीफ आवाज़ उठाइ थी।
2003
नाज़ फाउंडेशन द्वारा की गयी आपील दिल्ली हाइकोर्ट ने खारिज कर दी थी और फैसला सुनाने से मना कर दिया था।
2009
इस साल अच्छा ये हुआ था कि दिल्ली हाइ कोर्ट ने समलैंगिकता को अहराध की श्रेणी से हटा दिया था। साथ ही इसे संविधान के 14,15 और 21 के खिलाफ कर घोफित कर दिया था।
2012
इस साल सुप्रीम कोर्ट ने हाइ कोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए ये कहा था कि ये जुडिशियल मामला नहीं है।
2015
इस साल बतौर लोकसभा मेंमबर शशी थरूर समलैंगिकता को डिक्रिमिनलाइज़ करने के लिए लोकसभा प्रस्लाव लेकर गये थे।
2016
इसी प्रस्ताव पर एलजीबीटी समाज के 5 लोग सुप्रीम कोर्ट पहूचें। साथ ही इस बात की अपील की कि 377 पर सुनवाइ होनी चाहिए साथ ही इसे किसी भी तरह का अपराध नहीं मानना चाहिये।
2018
अखिर में आज के दिन कोर्ट ने वर्डिक्ट दिया कि है समलैंगिकता कोई अपराध नहीं है साथ ही इस समाज के लोग खुलकर जी सकते हैं। लेकिन इसी बीच सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गयी है।
Author- Anida Saifi
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